Monday, June 30, 2014

आईना

ऐ आईना,  आज ज़रा तू भी तो संवरजा...
में बैठी हूँ सामने तेरे,
तुझको देखके खुदको संवरने।
सोचा यु ही ज़रा क्यों न मुझको छोड़,
तूज़ीको संवारदुं ?
ऐ आईना,  आज ज़रा तू भी तो संवरजा...

गुलाबी पानी से नेहलादु,
एक चंदनका टिका लगादुं,
कई दिनों की जमी धूलको हटाकर
एक नया चेहेरा निखारदुं।
ए आइना, आज ज़रा तू भी तो संवरजा...

तुज़को देखके न जाने क्यों मुस्कुरा देते है लोग,
कभी शरमा जाते, कभी ठहर जाते है लोग।
ला, आज उन सारे चेहरों को हटाकर,
तुज़को अपना चेहरा दिखादुं।
ए आईना, आज ज़रा तू भी तो शरमाजा...

© २०१४ अभिजीत पंडित